Saturday, April 18, 2015

गीतिका वेदिका की लघु कथा - अपना घर




"माँ! ऐसे तो मैं कभी रूपये जोड़ ही नही पाऊँगी। फिर चोरी हो गए, मुझे हारमोनियम लेने के लिए तीन वर्ष से ऊपर हो गया जुगत लगाते।"
"तू जानती है न, तेरा भइया कभी चोरी कर ही नही सकता, उसे हम पैसों और कपड़ों से भरापूरा रखते है| और पेटी का क्या करेगी तू? एक दो साल में तुझे अपने घर जाना है न! वहीँ करियो तबला पेटी बासुँरी।"

1 comment: